सुभाष शर्मा रिश्वत मामला: गुरुग्राम के सेक्टर 38 में सिविल सर्जन के ऑफिस के अंदर

हरियाणा के तेजी से बढ़ते कॉरपोरेट शहर गुरुग्राम का सिविल सर्जन कार्यालय, सेक्टर-38 में स्थित यह इमारत, आम नागरिक के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की औपचारिक मंज़िल मानी जाती है। यहीं से डायग्नोस्टिक सेंटर, नर्सिंग होम, पीएनडीटी एक्ट के तहत अल्ट्रासाउंड सेंटरों की अनुमति, लाइसेंस और नवीनीकरण से जुड़े अहम फाइलें चलती हैं। इसी दफ्तर में तैनात 43 वर्षीय सहायक कर्मचारी सुभाष शर्मा पर हाल ही में 3.25 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में हुई गिरफ्तारी ने न सिर्फ इस कार्यालय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि ये भी दिखाया है कि कैसे एक काग़ज़ पर लगी मुहर की कीमत, व्यवस्था में ‘रेट लिस्ट’ में तब्दील हो जाती है। [1][2][3]

सेक्टर-38 का सिविल सर्जन ऑफिस: जहां से गुजरती हैं स्वास्थ्य से जुड़ी फाइलें

गुरुग्राम में स्वास्थ्य विभाग का जिला स्तर पर प्रमुख चेहरा सिविल सर्जन का होता है, जो जिले की स्वास्थ्य सेवाओं का प्रशासनिक मुखिया माना जाता है। सेक्टर-38 स्थित सिविल सर्जन कार्यालय, जिला अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य इकाइयों के बीच एक प्रशासनिक कड़ी का काम करता है। यहां से [4][5][6]

  • प्री-कंसेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक (पीएनडीटी) कानून के तहत सोनोग्राफी और डायग्नोस्टिक केंद्रों की अनुमति
  • लाइसेंस और NOC (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट)
  • स्वामित्व, मशीनरी और इक्विपमेंट के स्थानांतरण से जुड़े कागजात

जैसी प्रक्रियाएं निपटती हैं।[2][5]

कागज़ पर ये पूरी व्यवस्था क़ानून और नियमों से बंधी दिखती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन्हीं प्रक्रियाओं के बीच ‘फाइल रोकने’ और ‘आपत्ति लगाने’ की ताक़त रखने वाले लिपिकीय स्टाफ के हाथ में एक अदृश्य शक्ति भी आ जाती है — और सुभाष शर्मा का मामला इसी शक्ति के कथित दुरुपयोग की एक मिसाल बनकर सामने आया है।[3][1][2]

सुभाष शर्मा कौन हैं?

मामले से जुड़े आधिकारिक ब्योरे के मुताबिक, सुभाष शर्मा हरियाणा स्वास्थ्य विभाग के अधीन गुरुग्राम के सिविल सर्जन कार्यालय, सेक्टर-38 में सहायक (assistant) के पद पर तैनात थे। वह उस शाखा में काम कर रहे थे जो पीएनडीटी से जुड़े मामलों और डायग्नोस्टिक केंद्रों की फाइलों को संभालती है।[1][2][3]

उनकी भूमिका, कागज़ों में, एक लिपिकीय सहायक की मानी जाती है — यानी फाइलों का रख-रखाव, नोटिंग, आपत्तियां अंकित करना, और संबंधित अफ़सर के हस्ताक्षर के लिए फाइल आगे बढ़ाना। लेकिन ACB (एंटी-करप्शन ब्यूरो) के मुताबिक, इसी प्रक्रिया के दौरान उन पर एक निजी डायग्नोस्टिक सेंटर से मोटी रकम की रिश्वत मांगने और लेते हुए पकड़े जाने के आरोप लगे हैं।[2][3][1]

Atrium Diagnostics की फाइल और 5 लाख से 3.25 लाख तक की ‘डील’

मामले की बुनियाद एक निजी डायग्नोस्टिक सेंटर की साधारण-सी दिखने वाली प्रशासनिक ज़रूरत से शुरू होती है। गोल्फ कोर्स रोड स्थित ‘एट्रियम डायग्नोस्टिक्स’ के मालिक ने अपना सेंटर ‘अल्फा डायग्नोस्टिक्स’ को बेच दिया था। स्वामित्व परिवर्तन के बाद, नियमानुसार, सिविल सर्जन दफ्तर में NOC के लिए आवेदन करना आवश्यक होता है।[1][2]

रिपोर्टों के अनुसार:

  • 31 अक्तूबर को NOC के लिए आवेदन दायर किया गया।[2][1]
  • फाइल सेक्टर-38 स्थित सिविल सर्जन कार्यालय में, पीएनडीटी से जुड़े डिप्टी सिविल सर्जन की शाखा को भेजी गई, जहां सुभाष शर्मा तैनात थे।[1][2]
  • फाइल पर आपत्तियां उठाई गईं और कहा गया कि कुछ कागज़ात और स्पष्ट किए जाएं।
  • 21 नवंबर को सेंटर की ओर से विस्तृत उत्तर जमा कर दिया गया।[2][1]

लेकिन फाइल वहीं नहीं रुकी — आरोप है कि जवाब देने के बाद भी सुभाष शर्मा ने एक और आपत्ति उठा दी, इस बार मशीनरी यानी सोनोग्राफी मशीन के स्वामित्व हस्तांतरण को लेकर। यह आपत्ति तकनीकी थी, लेकिन शिकायतकर्ता के मुताबिक, इसे आधार बनाकर फाइल को आगे बढ़ाने के बदले ‘राशि’ की डिमांड शुरू हुई।[3][1][2]

ACB के अनुसार, पहले 5 लाख रुपये की रिश्वत की मांग की गई, जिसे कथित तौर पर एक दिन के भीतर NOC क्लियरेंस दिलाने की ‘गारंटी’ के साथ जोड़ा गया। बाद में सौदा 3.25 लाख रुपये पर तय हुआ।[3][1][2]

एंटी-करप्शन ब्यूरो की जाल बिछाने की कार्रवाई

रिश्वत मांग से परेशान होकर डायग्नोस्टिक सेंटर के मालिक ने हरियाणा सरकार के एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) का दरवाज़ा खटखटाया। शिकायत दर्ज हुई और उसके बाद एक क्लासिक ‘ट्रैप ऑपरेशन’ की रणनीति बनाई गई, जो अक्सर भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां अपनाती हैं।[3][1][2]

  • शिकायत में आरोप था कि सरकारी काम यानी NOC जारी करने के बदले सुभाष शर्मा द्वारा 3.25 लाख रुपये की मांग की जा रही है।[1][2]
  • ACB ने शिकायत की प्रारंभिक जांच कर आरोपों की पुष्टि की।
  • तय दिन, शिकायतकर्ता को सलाह दी गई कि वह सहमति के अनुसार रकम लेकर सिविल सर्जन कार्यालय पहुंचे।
  • पैसे एक बैकपैक (बैग) में रखकर दिए गए।[2][3][1]
  • जैसे ही बैग सुभाष शर्मा के कब्जे में आया, ACB की टीम ने कार्यालय में छापेमारी की और बैग से 3.25 लाख रुपये बरामद होने का दावा किया।[3][1][2]

इसके तुरंत बाद, सुभाष शर्मा को मौके से गिरफ्तार कर लिया गया।

कानूनी मामला: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत FIR

ACB ने इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया है। यह धारा किसी भी सार्वजनिक सेवक द्वारा किसी आधिकारिक कार्य के बदले रिश्वत की मांग या स्वीकार करने पर लागू होती है।[1][2][3]

FIR में आरोप है कि:

  • सुभाष शर्मा ने एक सरकारी प्रक्रिया (NOC जारी करने) को जानबूझकर रोका।
  • तकनीकी आपत्तियों को आधार बनाकर शिकायतकर्ता पर अनावश्यक दबाव डाला।[2][1]
  • फाइल आगे बढ़ाने के बदले नकद रकम की मांग की।
  • ACB की उपस्थिति में, पूर्व-निश्चित योजना के तहत, कथित रिश्वत स्वीकार की गई।[3][1][2]

कानूनन, अगर अदालत में आरोप साबित होते हैं, तो दोषसिद्धि की स्थिति में सज़ा में कारावास और जुर्माना दोनों संभव हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ऐसे मामलों में अदालतें अक्सर कड़ी दृष्टि अपनाती हैं, क्योंकि यह सीधे-सीधे जनता के अधिकारों और प्रशासनिक निष्पक्षता पर चोट मानी जाती है।

सिविल सर्जन ऑफिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्न

यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक कर्मचारी पर लगे आरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सिस्टम की नीयत और नज़रिया भी सवालों के घेरे में आ जाता है।

हरियाणा में जिला स्तर पर सिविल सर्जन को स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख माना जाता है, जो:

  • जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की निगरानी करता है।[5][4]
  • टीकाकरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों और रोग नियंत्रण योजनाओं के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी संभालता है।[5]
  • स्टाफ की तैनाती, अनुशासनात्मक कार्यवाहियों और प्रशासनिक अनुमति पत्र जैसी फाइलों की निगरानी करता है।

ऐसे में, अगर इसी ढांचे के भीतर कोई लिपिकीय कर्मचारी फाइल को ‘बंधक’ बनाकर निजी वसूली करने लगे, तो यह न सिर्फ एक व्यक्ति की गलती है, बल्कि एक व्यापक संस्थागत समस्या की ओर इशारा भी है।[1][2][3]

सवाल यह भी उठता है कि:

  • क्या फाइल मूवमेंट पर पर्याप्त डिजिटल ट्रैकिंग मौजूद है?
  • क्या अधिकारी स्तर पर सुपरविजन इतना ढीला है कि एक सहायक महीनों फाइल को रोके रख सकता है?
  • क्या इस तरह की कथित वसूली में अकेले निचले स्तर का कर्मचारी शामिल होता है या कोई अनौपचारिक ‘श्रृंखला’ भी होती है? ACB ने जांच जारी रहने की बात कही है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्या यह सिर्फ सुभाष शर्मा का व्यक्तिगत कृत्य था या किसी और स्तर तक इसकी परछाईं जाती है।[2][3]

निजी स्वास्थ्य क्षेत्र और सरकारी अनुमति की जटिलता

गुरुग्राम जैसा शहर, जहां कॉरपोरेट हॉस्पिटल, हाई-एंड डायग्नोस्टिक सेंटर और नर्सिंग होम की भरमार है, वहां सरकारी अनुमतियों की प्रक्रिया खुद एक अलग ‘इकोनॉमी’ बना देती है।

  • पीएनडीटी कानून के तहत सोनोग्राफी केंद्रों के लिए कड़े नियम हैं, ताकि भ्रूण लिंग परीक्षण पर रोक लगाई जा सके।[5][2]
  • हर नई मशीन, नए केंद्र या स्वामित्व में बदलाव के लिए NOC और पंजीकरण अनिवार्य है।
  • कागज़ों में यह प्रक्रिया पारदर्शी और स्पष्ट है, लेकिन व्यवहार में अक्सर केंद्र संचालक देरी, आपत्तियों और ‘सुधारो फिर लाओ’ जैसे अनौपचारिक व्यवहार का सामना करते हैं।

यहीं से, कई बार, कथित ‘रिश्वत बाजार’ शुरू होता है — जहां देरी से बचने, निरीक्षण जल्दी कराने या आपत्तियां हटवाने के नाम पर रकम की मांग की जाती है। सुभाष शर्मा पर लगे आरोप, इसी पैटर्न की एक तस्वीर जैसे लगते हैं, जिसमें एक डायग्नोस्टिक सेंटर की वैध ट्रांजैक्शन (स्वामित्व परिवर्तन) को भी कथित तौर पर ‘कमीशन का मौका’ बना लिया गया।[3][1][2]

जनता का भरोसा और स्वास्थ्य तंत्र की साख

स्वास्थ्य सेवाओं का तंत्र सिर्फ दवाइयों, बेड और डॉक्टर तक सीमित नहीं होता; इसमें वो प्रशासनिक ढांचा भी शामिल है जो तय करता है कि कौन-सा केंद्र खुलेगा, कैसे चलेगा, और किन मानकों पर चलेगा। जब उसी ढांचे में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो नुकसान कई स्तर पर होता है:

  • जनता का भरोसा कमजोर पड़ता है, जो पहले ही सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर सवाल उठाती रहती है।[5]
  • ईमानदारी से काम करने वाले निजी केंद्रों को भी शक की नज़र से देखा जाने लगता है, क्योंकि उनके लाइसेंस और अनुमतियां भी इसी तंत्र से होकर निकलती हैं।
  • सरकारी दफ्तरों की छवि और अधिक अविश्वसनीय हो जाती है, खासकर उन शहरों में जहां निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पहले से ही मजबूत और महंगा है।

ACB की कार्रवाई एक सख्त संदेश जरूर देती है कि रिश्वतखोरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन यह भी उतना ही ज़रूरी है कि ऐसे मामलों के बाद संरचनात्मक सुधार पर भी गंभीरता से विचार हो।[1][2][3]

क्या ज़रूरी हैं सिस्टम में सुधार?

सुभाष शर्मा जैसे मामलों से सबक लेते हुए विशेषज्ञ और नागरिक समाज लंबे समय से कुछ बुनियादी सुधारों की मांग करते रहे हैं:

  • पूरी तरह डिजिटल फाइल ट्रैकिंग:
    हर NOC, लाइसेंस और आवेदन की ऑनलाइन एंट्री, स्टेटस अपडेट और रीयल-टाइम ट्रैकिंग, ताकि किसी एक कर्मचारी के पास फाइल ‘अटकी’ न रह सके।
  • टाइम-बाउंड सर्विस गारंटी:
    तय समय सीमा में फाइल न निपटने पर उसका स्वतः उच्च स्तर पर एस्केलेशन हो, जैसा कि कुछ राज्यों में RTPS (Right to Public Service) मॉडल के जरिए लागू किया गया है।
  • फाइल पर सार्वजनिक रिमार्क:
    किस अधिकारी या कर्मचारी ने कौन-सी आपत्ति लगाई, यह सब ऑनलाइन रिकॉर्ड और आवेदक के लिए दृश्य हो, ताकि ‘मौखिक आपत्ति’ के नाम पर दबाव न बनाया जा सके।
  • ACB को आसान पहुंच:
    आम नागरिकों के लिए शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया और आसान, तेज़ और सुरक्षित बने, ताकि लोग बिना डर के भ्रष्टाचार की शिकायत कर सकें। ACB पहले ही जनता से अपील कर चुका है कि यदि कोई अधिकारी काम के बदले पैसे मांगे तो तुरंत सूचना दें।[2][3][1]

निष्कर्ष: एक व्यक्ति नहीं, पूरी मानसिकता कटघरे में

सुभाष शर्मा की गिरफ्तारी की कहानी महज़ एक सरकारी कर्मचारी की व्यक्तिगत कथित लालच की कहानी नहीं है; यह उस संस्थागत माहौल की तस्वीर भी है जिसमें फाइलें अक्सर रिश्वत की ‘मुद्रा’ बन जाती हैं और अधिकार, सेवा की जगह, सौदेबाज़ी का औज़ार बन जाते हैं। [3][1][2]

गुरुग्राम जैसे शहर में, जहां ग्लास टॉवर और कॉरपोरेट हॉस्पिटल की चमक दिखती है, वहीं सेक्टर-38 के सिविल सर्जन कार्यालय की दीवारों के भीतर चल रही यह खामोश सौदेबाज़ी हमें याद दिलाती है कि व्यवस्था का असली चेहरा काउंटर के पीछे बैठे कर्मचारी के बर्ताव से ही तय होता है।

फिलहाल, मामला अदालत और जांच एजेंसी के पाले में है, और कानून के तहत सुभाष शर्मा को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाएगा। लेकिन जो सवाल इस घटनाक्रम ने उठाए हैं, वे इससे कहीं बड़े हैं — और जब तक फाइलों की नियति किसी एक कर्मचारी की मेज़ और ‘मूड’ पर टिकी रहेगी, तब तक गुरुग्राम हो या कोई और जिला, सिविल सर्जन जैसे दफ्तरों से जुड़ी यह कहानी बार-बार दोहराई जाती रहेगी।[5][1][2]


  1. https://timesofindia.indiatimes.com/city/gurgaon/in-gurgaon-assistant-in-civil-surgeons-office-caught-taking-bribe/articleshow/125726928.cms                      
  2. https://www.hindustantimes.com/cities/gurugram-news/gurugram-43-year-old-official-arrested-for-taking-3-25-lakh-bribe-in-civil-surgeon-s-office-101764699854771.html                         
  3. https://www.ayto-santiurde.com/campamento-de-verano-2019/?s-news-16345186-2025-12-03-gurugram-official-arrested-for-bribery-in-civil-surgeons-office                
  4. https://hryesi.gov.in/divisions/civil-surgeon/ 
  5. https://nuh.gov.in/health/      
  6. https://gurugram.gov.in/directory/b-k-arora/
  7. https://www.practo.com/gurgaon/doctor/dr-subhash-chandra-sharma-general-surgeon-2
  8. https://www.hexahealth.com/gurgaon/hospital/civil-hospital
  9. https://ulbharyana.gov.in/330
  10. https://www.migranodearena.org/reto/18403/kilomet?s-news-16345126-2025-12-03-gurugram-43-year-old-official-acquitted-of-all-charges-in-civil-surgeons-office-case