भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 478: जमानत के संबंध में व्यापक विश्लेषण
परिचय
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 – BNSS) को 1 जुलाई, 2023 को भारत में लागू किया गया, जो 1973 के आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) को प्रतिस्थापित करता है। BNSS की धारा 478 दंड प्रक्रिया में जमानत का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। यह धारा बालिग अपराधों में जमानत के अधिकार को स्पष्ट करती है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक निरीक्षण के बीच संतुलन बनाती है[1]। यह लेख धारा 478 के सभी पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण प्रदान करता है।
धारा 478 का पाठ
मूल प्रावधान
धारा 478 में दो उप-खंड हैं:
(1) जमानत का अधिकार: जब कोई व्यक्ति गैर-जमानती अपराध का आरोपी नहीं है और पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या नजरबंद किया जाता है, या किसी भी समय अदालत के समक्ष पेश होता है, तो वह जमानत देने के लिए तैयार है, तो ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए[1]।
(2) जमानत से इंकार: यदि कोई व्यक्ति जमानत बांड या बांड की शर्तों का पालन करने में विफल रहा है, विशेषकर अदालत में उपस्थिति के समय और स्थान के संबंध में, तो अदालत उसे बाद के अवसर पर जमानत देने से इंकार कर सकती है[1]।
धारा 478 के प्रमुख प्रावधान
1. बालिग अपराधों में जमानत का अधिकार
धारा 478(1) का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बालिग अपराधों में जमानत एक अधिकार है, न कि अनुग्रह। यह सभी आरोपियों को स्वतंत्रता की गारंटी देता है जो गैर-जमानती अपराधों से संबंधित नहीं हैं। अदालत या पुलिस अधिकारी को बिना उचित कारण के जमानत से इंकार नहीं कर सकते[1]।
2. दरिद्र व्यक्तियों के लिए व्यवस्था
BNSS ने एक महत्वपूर्ण सुधार किया है जो गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को संरक्षण देता है। यदि कोई व्यक्ति:
- दरिद्र है
- जमानती को प्रदान नहीं कर सकता
- गिरफ्तारी की तारीख से सात दिन के भीतर जमानत बांड देने में सक्षम नहीं है
तो अदालत या पुलिस अधिकारी को उसे व्यक्तिगत प्रतिबद्धता पर रिहा करना चाहिए। यह सत्ताईस सात दिन की व्याख्या धारा 478 के अन्तर्गत दी गई है, जिससे दरिद्र व्यक्तियों को दरिद्रता साबित करने का अवसर मिलता है[1]।
3. व्यक्तिगत बांड का विकल्प
जब कोई व्यक्ति जमानती प्रदान नहीं कर सकता, तो अदालत या पुलिस अधिकारी उसे व्यक्तिगत बांड पर रिहा कर सकता है। यह बांड केवल आरोपी की व्यक्तिगत प्रतिबद्धता से होता है, बिना किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी के[1]।
4. जमानत की शर्तें
जमानत पर रिहाई के लिए कुछ शर्तें हो सकती हैं:
- आरोपी को अदालत में निर्धारित समय और स्थान पर हाजिर होना चाहिए
- आरोपी को पुलिस सहयोग में भाग लेना चाहिए
- आरोपी को अदालत की अनुमति के बिना देश छोड़ने से मना किया जा सकता है
इन शर्तों का पालन न करने से जमानत रद्द की जा सकती है[1]।
5. जमानत से इंकार के आधार
धारा 478(2) के अनुसार, अदालत निम्नलिखित परिस्थितियों में जमानत से इंकार कर सकती है:
- पूर्व गैर-अनुपालन: यदि आरोपी पहले जमानत की शर्तों का पालन नहीं किया है
- अदालत में अनुपस्थिति: यदि आरोपी पहले अदालत में उपस्थिति में विफल रहा है
- बांड का उल्लंघन: यदि जमानत बांड की शर्तों का उल्लंघन किया गया है
यह संरक्षण न्यायिक प्रक्रिया को सुचारु रूप से चलाता है[1]।
6. अपवाद और प्रभाव
धारा 478 के अन्तर्गत कुछ अपवाद हैं:
- धारा 135(3): आत्मसमर्पण से संबंधित विशेष प्रावधान
- धारा 492: बांड जब्त करने से संबंधित नियम
- गैर-जमानती अपराध: यह धारा गैर-जमानती अपराधों पर लागू नहीं होती है
ऐसे अपराधों के लिए अन्य प्रावधान (जैसे धारा 480 – गैर-जमानती अपराधों में जमानत) लागू होते हैं[1]।
BNSS 2023 में सुधार और परिवर्तन
CrPC, 1973 से तुलना
BNSS ने पुरानी CrPC की धारा 436 को प्रतिस्थापित करते हुए कई सुधार किए हैं:
| पहलू | CrPC धारा 436 | BNSS धारा 478 |
| दरिद्र व्यक्तियों की परिभाषा | सामान्य | स्पष्ट परिभाषा (7 दिन का मानदंड) |
| व्यक्तिगत बांड | उपलब्ध | स्पष्ट रूप से परिभाषित |
| शर्तें | विस्तृत नहीं | विस्तृत प्रावधान |
| प्रक्रिया | कम स्पष्ट | अधिक स्पष्ट और संरचित |
BNSS ने दरिद्रता के मानदंड को स्पष्ट किया है, जिससे निम्न आय वर्ग के व्यक्तियों को बेहतर संरक्षण मिलता है[2]।
दरिद्रता का मानदंड
BNSS की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह दरिद्रता के लिए एक वस्तुनिष्ठ मानदंड प्रदान करती है। यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तारी की तारीख से सात दिन के भीतर जमानत बांड देने में सक्षम नहीं है, तो यह अदालत के लिए एक पर्याप्त कारण है यह मान लेने का कि वह दरिद्र है[2]। यह प्रावधान निम्न वर्गों के व्यक्तियों की रक्षा करता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
उदाहरण 1: बालिग अपराध में जमानत
परिस्थिति: राज कपूर पर चोरी का आरोप है, जो एक बालिग अपराध है। वह पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जाता है।
अनुप्रयोग: धारा 478 के तहत, राज को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए क्योंकि:
- चोरी एक बालिग अपराध है
- वह जमानत के लिए तैयार है
- वह किसी गैर-जमानती अपराध का आरोपी नहीं है[2]
उदाहरण 2: दरिद्र व्यक्ति की जमानत
परिस्थिति: प्रिया एक गरीब दिहाड़ी मजदूर है। उस पर साधारण चोट पहुंचाने का आरोप है। वह जमानती प्रदान करने में असमर्थ है।
अनुप्रयोग: अदालत यह मान सकती है कि प्रिया दरिद्र है क्योंकि वह गिरफ्तारी के बाद सात दिन में जमानत बांड नहीं दे सकती। इसलिए, अदालत उसे व्यक्तिगत बांड पर रिहा कर सकती है[2]।
उदाहरण 3: जमानत की शर्तों का उल्लंघन
परिस्थिति: आर्जुन को जमानत पर रिहा किया गया था, लेकिन वह कई बार अदालत में उपस्थिति में विफल रहा। अब वह फिर से पकड़ा जाता है।
अनुप्रयोग: धारा 478(2) के अनुसार, अदालत को आर्जुन को इस बार जमानत देने से इंकार करने का अधिकार है क्योंकि वह पूर्व में जमानत की शर्तों का पालन नहीं किया[2]।
धारा 478 के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत
1. मानव अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। धारा 478 इस अधिकार को सुरक्षित करती है क्योंकि यह सभी आरोपियों को जमानत का अधिकार देती है, जब तक कि वे गैर-जमानती अपराधों से संबंधित नहीं हैं[3]।
2. न्याय तक पहुंच
धारा 478 गरीब व्यक्तियों को न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करती है। दरिद्र व्यक्तियों के लिए व्यक्तिगत बांड की व्यवस्था करके, यह सुनिश्चित करता है कि गरीबी किसी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं करती है[3]।
3. न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास
यह धारा न्यायिक प्रक्रिया में आरोपी के सहयोग को प्रोत्साहित करती है क्योंकि आरोपी को पता है कि यदि वह जमानत की शर्तों का पालन करता है, तो उसे रिहाई मिलेगी।
बालिग बनाम गैर-जमानती अपराध
बालिग अपराध
बालिग अपराध वे होते हैं जिनमें जमानत का अधिकार होता है:
- चोरी (IPC धारा 379)
- सरल चोट (IPC धारा 337)
- बेईमानी (IPC धारा 415)
इन अपराधों में, आरोपी को आमतौर पर अदालत द्वारा जमानत दी जा सकती है[3]।
गैर-जमानती अपराध
गैर-जमानती अपराध वे हैं जिनमें गंभीर दंड होता है:
- हत्या (IPC धारा 302)
- बलात्कार (IPC धारा 376)
- आतंकवाद के कार्य
इन अपराधों में, जमानत देना अदालत के विवेक पर निर्भर करता है, और धारा 478 लागू नहीं होती है। इसके बजाय, धारा 480 (गैर-जमानती अपराधों में जमानत) लागू होती है[3]।
धारा 478 के साथ संबंधित अन्य महत्वपूर्ण धाराएं
धारा 479: जमानत और बांड के संबंध में परिभाषाएं
यह धारा “जमानत” और “बांड” की परिभाषाएं प्रदान करती है, जिससे धारा 478 को समझना आसान हो जाता है[1]।
धारा 480: गैर-जमानती अपराधों में जमानत
यह धारा गैर-जमानती अपराधों में जमानत के अधिकार को परिभाषित करती है। इसमें अदालत को अधिक विवेक होता है[1]।
धारा 481: अपील अदालत के सामने उपस्थिति
यह धारा सुनिश्चित करती है कि अदालत आरोपी को यह अनिवार्य कर सकती है कि वह अपील अदालत में उपस्थित हो। यह धारा 478 से संबंधित है क्योंकि यह जमानत की शर्तों को निर्धारित करता है[1]।
धारा 482: पूर्व-गिरफ्तारी जमानत
यह धारा आशंकित जमानत (anticipatory bail) से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति को गैर-जमानती अपराध के लिए गिरफ्तारी की आशंका है, तो वह उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय से पहले से जमानत के लिए आवेदन कर सकता है[1]।
न्यायिक प्रावधान और व्याख्या
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत के अधिकार को स्पष्ट करने के लिए कई निर्णय दिए हैं:
Gurbaksh Singh Sibbia v. State of Punjab (1980): इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जमानत का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है और संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा सुरक्षित है[3]।
Satender Kumar Antil v. CBI (2022): इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत को एक मानवाधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए, और न्यायालयों को आरोपियों को जमानत देने में उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए[3]।
व्यावहारिक सुझाव आरोपियों के लिए
जमानत आवेदन के लिए दस्तावेज
जमानत के लिए आवेदन करते समय, निम्नलिखित दस्तावेज प्रस्तुत करें:
- पहचान पत्र: आधार कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट
- आवास प्रमाण: बिजली बिल, राशन कार्ड, अनुबंध पत्र
- आय प्रमाण: यदि दरिद्रता का दावा किया जा रहा है
- जमानती की जानकारी: यदि जमानती प्रदान की जा सकती है
जमानत की शर्तों का पालन
जमानत पर रिहा होने के बाद:
- सभी न्यायिक तारीखों पर समय पर उपस्थित हों
- पुलिस के निर्देशों का पालन करें
- अदालत की अनुमति के बिना स्थान परिवर्तन न करें
- किसी भी साक्ष्य को नष्ट न करें या गवाहों को प्रभावित न करें
निष्कर्ष
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 478 बालिग अपराधों में जमानत के अधिकार को सुरक्षित करती है। यह धारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाती है[1]। दरिद्र व्यक्तियों के लिए व्यक्तिगत बांड की व्यवस्था करके, यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक कमजोरी किसी को न्याय से वंचित नहीं करती है।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि आरोपी जमानत की शर्तों का पालन करें। जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने से न केवल भविष्य में जमानत देने से इंकार किया जा सकता है, बल्कि आरोपी के विरुद्ध अतिरिक्त आपराधिक कार्यवाही भी की जा सकती है।
धारा 478 संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) को व्यावहारिक रूप में लागू करने का एक तरीका है, और यह भारतीय कानून व्यवस्था में एक उदार और न्यायसंगत दृष्टिकोण प्रदान करता है।
संदर्भ
[1] भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023, धारा 478, 479, 480, 481, 482। https://www.indiacode.nic.in
[2] अपनीलॉ (ApniLaw)। “Section 478 – भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)।” https://www.apnilaw.com/bare-act/bnss/section-478-bharatiya-nagarik-suraksha-sanhita-bnss-in-what-cases-bail-to-be-taken/
[3] प्रशांत कन्हा। “Section 478 BNSS 2023: बेल और संबंधित प्रावधान।” https://www.prashantkanha.com/section-478-bnss-bhartiya-nagarik-suraksha-sanhita-2023-equivalent-cr-p-c-section/















