Sec 138 का महत्व और उद्देश्य

धारा 138, 1881 के negotiable instruments act में चेक dishonour (बाउंस) को दंडनीय अपराध बनाती है, ताकि व्यापारिक लेन‑देन में चेक पर भरोसा बना रहे।[2][1]
सिविल उपाय (सिविल सूट आदि) पहले से उपलब्ध थे, लेकिन निरोधात्मक असर के लिए 1988 के संशोधन से 138–142 धारणाएँ जोड़ी गईं, ताकि चेक के माध्यम से भुगतान को प्रोत्साहित किया जा सके और उसकी विश्वसनीयता बढ़े।[2]

धारा 138 का सार – साधारण भाषा में

धारा 138 का मूल अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते पर किसी देय ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए चेक जारी करे और वह चेक बैंक द्वारा इस आधार पर अनादर (dishonour) कर दिया जाए कि खाते में पर्याप्त धन नहीं है या पहले से तय सीमा से अधिक है, तो कुछ शर्तें पूरी होने पर वह व्यक्ति अपराध का दोषी माना जाएगा।[1][2]
इस अपराध के लिए अधिकतम दंड दो वर्ष तक का कारावास, या चेक राशि की दोगुनी तक का जुर्माना, या दोनों हो सकता है।[3][1]

अपराध के आवश्यक घटक (Ingredients)

किसी 138 के केस में दोषसिद्धि के लिए कुछ अनिवार्य घटकों का होना ज़रूरी है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी बार‑बार दोहराया है।[4][2]

मुख्य घटक इस प्रकार हैं:[5][1]

  • आरोपी ने complainant के पक्ष में कोई चेक ड्रॉ किया हो, जो किसी देय ऋण या अन्य विधिक देनदारी (legally enforceable debt or liability) के भुगतान के लिए हो।[1][2]
  • वह चेक निर्धारित अवधि के भीतर (वर्तमान में सामान्यतः तीन माह के अंदर) बैंक में प्रस्तुत किया गया हो।[5][2]
  • बैंक ने चेक को “insufficient funds” या “exceeds arrangement” जैसी वजह से अनादर करके लौटाया हो।[5][1]
  • चेक लौटने की सूचना (cheque return memo) मिलने के 30 दिन के भीतर complainant ने विधिक मांग‑पत्र (statutory legal notice) भेजा हो।[6][1]
  • नोटिस प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर भी drawer ने भुगतान न किया हो।[6][1]
  • इन 15 दिनों के बाद जो cause of action उत्पन्न होता है, उसके 30 दिन के भीतर मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत दायर की गई हो।[6][1]

यदि इनमें से कोई एक भी कड़ी टूटती है, तो सामान्यत: धारा 138 के तहत अभियोजन टिक पाना मुश्किल हो जाता है।[1][5]

Limitation और टाइम‑लाइन – युवा अधिवक्ताओं के लिए याद रखने योग्य

टाइम‑लाइन 138 के मामलों में बहुत महत्वपूर्ण है, और छोटी सी चूक पूरी शिकायत को बेअसर कर सकती है।[6][1]

क्रम को इस तरह याद रखें:[5][6]

  1. Cheque validity – चेक ड्रॉ होने की तारीख से सामान्यत: तीन माह के भीतर उसे बैंक में प्रस्तुत करना ज़रूरी है।[2][5]
  2. Dishonour और memo – बैंक से लिखित cheque return memo प्राप्त करें, जिसमें dishonour की वजह लिखी हो।[6]
  3. Legal notice – memo की तारीख से 30 दिनों के भीतर demand notice भेजना अनिवार्य है।[1][6]
  4. 15 दिन की grace period – नोटिस प्राप्त होने के बाद drawer को भुगतान के लिए 15 दिन का समय मिलता है।[1][6]
  5. Complaint filing – 15 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद अगले 30 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दाख़िल करनी होगी।[6][1]

कई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों में कहा गया है कि valid statutory notice के बिना और prescribed सीमा से बाहर की शिकायत पर cognizance नहीं लिया जा सकता।[7][4]

अपराध की पूर्ति कब मानी जाती है?

सिर्फ चेक का dishonour होना अपराध को पूरा नहीं कर देता; offence तब पूर्ण होता है जब:[8][4]

  • चेक dishonour हो,
  • वैध नोटिस भेजा जाए,
  • नोटिस प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर राशि का भुगतान न किया जाए।[8][1]

इसी कारण territorial jurisdiction और limitation की गणना में इस पूरी श्रृंखला को ध्यान में रखा जाता है।[9][8]

क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) की बुनियादी समझ

वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने territorial jurisdiction पर कई बार law स्पष्ट किया है कि शिकायत कहाँ दायर की जा सकती है।[10][8]
नवीनतम रुझानों में यह सिद्धांत उभरकर आया है कि केस प्रायः उस कोर्ट में चलेगा जहाँ complainant के खाते की home branch स्थित है, जहाँ चेक प्रस्तुति और dishonour हुआ।[3][8]

एक युवा अधिवक्ता के लिए यह देखना ज़रूरी है कि:

  • complainant का बैंक कहाँ स्थित है,
  • cheque प्रस्तुत कहाँ हुआ,
  • dishonour memo किस branch से जारी हुआ,
    और इन्हीं तथ्यों के आधार पर उचित कोर्ट चुना जाए।[9][8]

विधिक अनुमान (Statutory Presumptions) – धारा 118 और 139

धारा 138 के मामलों में complainant को सबसे बड़ी सहायता धारा 118 और 139 के तहत मिलने वाले वैधानिक अनुमानों से मिलती है।[11][12]

  • धारा 118 के तहत यह अनुमान है कि negotiable instrument उचित विचार (consideration) के बदले में और नियमानुसार बनाया गया है।[11]
  • धारा 139 में विशेष रूप से यह अनुमान लगाया जाता है कि चेक किसी legally enforceable debt या liability के निर्वहन के लिए जारी किया गया है।[12][2]

ये अनुमान rebuttable हैं; अर्थात आरोपी सबूत के आधार पर इन्हें खंडित कर सकता है, लेकिन प्रारंभिक लाभ complainant को मिलता है।[12][11]
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आरोपी को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए ‘beyond reasonable doubt’ नहीं, बल्कि preponderance of probabilities के मानक पर अपना बचाव स्थापित करना होता है।[12]

प्रमुख न्यायिक सिद्धांत – कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों की दिशा

कई निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 138 के तत्वों और presumption के दायरे को स्पष्ट किया है।[13][4]

  • एक निर्णय में कोर्ट ने कहा कि शिकायत में स्पष्ट रूप से सभी ingredients – चेक, debt/liability, प्रस्तुति, dishonour, notice और non‑payment – का उल्लेख होना चाहिए; केवल सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं होंगे।[4][2]
  • अन्य मामलों में अदालतों ने territorial jurisdiction, successive dishonours पर prosecution, और compounding (आपसी समझौते से मामला समाप्त) जैसे प्रश्नों पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया है।[10][13]
  • कई बाद के निर्णयों में यह भी कहा गया कि यदि चेक राशि सहित ब्याज आदि complainant को मिल जाए, तो criminal प्रक्रिया को compounding के माध्यम से समाप्त करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक आपराधिक मुकदमेबाज़ी कम हो सके।[10][3]

आपको केस‑लॉ की गहराई में जाने के लिए समय‑समय पर सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम निर्णयों और law reports को पढ़ते रहना चाहिए।[13][12]

हाल के व्यावहारिक अपडेट (2025 के बाद की प्रवृत्तियाँ)

हाल की नीतियों और न्यायिक दिशा‑निर्देशों के आधार पर चेक बाउंस मामलों में कुछ महत्वपूर्ण व्यावहारिक परिवर्तन दिखाई देते हैं।[3][6]

  • डिजिटल summons: कई न्यायालय ई‑मेल, एसएमएस, व्हाट्सऐप आदि के माध्यम से समन की सेवा स्वीकार कर रहे हैं, ताकि सेवा प्रक्रिया तेज़ हो सके।[3]
  • प्रारंभिक synopsis: कई जगहों पर हर शिकायत के साथ एक संक्षिप्त synopsis/brief timeline लगाना आवश्यक किया जा रहा है, जिसमें चेक, नोटिस और transaction की chronology हो।[3]
  • ऑनलाइन भुगतान और early settlement: कुछ अदालतें आरंभिक चरण में ही cheque amount को ऑनलाइन या QR/UPI के माध्यम से जमा कराकर early settlement को प्रोत्साहित कर रही हैं।[3]
  • Summary/समन ट्रायल: मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए summary trial या summons trial के माध्यम से अनावश्यक adjournments को कम करने पर ज़ोर दिया जा रहा है।[3][6]

एक युवा अधिवक्ता के रूप में आपको अपने ज़िले और राज्य की प्रचलित प्रैक्टिस और स्थानीय circulars पर भी नज़र रखना चाहिए।[13][6]

Complainant पक्ष के लिए ड्राफ्टिंग टिप्स

1. Statutory Notice ड्राफ्ट करते समय

नोटिस आपकी पूरी शिकायत की नींव है; इसकी वैधता पर ही पूरा अभियोजन टिका होता है।[1][6]

ध्यान रखें:

  • नोटिस 30 दिन के भीतर भेजा जाए, और तारीख़ें स्पष्ट लिखी जाएँ (cheque date, presentation date, dishonour date, memo date)।[6][1]
  • चेक का नंबर, तारीख़, राशि, ड्रॉइंग बैंक और ब्रांच का पूरा विवरण दें।[5][1]
  • नोटिस में यह स्पष्ट लिखें कि चेक किसी विशिष्ट ऋण या देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया था और dishonour होने के बावजूद भुगतान नहीं हुआ।[2][1]
  • नोटिस में 15 दिन के भीतर पूरी राशि का भुगतान माँगें और चेतावनी दें कि अन्यथा धारा 138 के तहत विधिक कार्यवाही की जाएगी।[1][6]

Speed post/registered AD, courier, ई‑मेल आदि माध्यमों का उपयोग करते हुए service का पूरा रिकॉर्ड रखें।[3][6]

2. Complaint Draft

शिकायत में निम्न बिंदुओं को विशेष रूप से व्यवस्थित ढंग से plead करें:[2][1]

  • पक्षकारों का पूरा परिचय और आपसी लेन‑देन का संक्षिप्त इतिहास।
  • यह तथ्य कि चेक legally enforceable debt/liability के लिए जारी किया गया था (loan, goods supplied, services, security आदि की प्रकृति बताते हुए)।[12][2]
  • चेक का विवरण, प्रस्तुति, dishonour की तारीख़ और कारण (memo के शब्दों के अनुरूप)।[5][1]
  • नोटिस भेजने की तारीख़, mode, और नोटिस की service का विवरण।[6][1]
  • 15 दिन की अवधि के भीतर भुगतान न होने का स्पष्ट उल्लेख।[1][6]
  • यह उल्लेख कि शिकायत limitation के भीतर दायर की जा रही है और इस कोर्ट को territorial jurisdiction प्राप्त है (तथ्यों के आधार पर)।[8][9]

साथ में निम्न दस्तावेज़ annex करें: चेक की कॉपी, मेमो, नोटिस की कॉपी, dispatch receipt, tracking report, bank statement (यदि आवश्यक हो) आदि।[14][6]

आम बचाव (Defences) और complainant की रणनीति

आरोपी प्रायः कुछ सामान्य बचाव उठाते हैं; एक युवा अधिवक्ता को पहले से उनका अनुमान लगाकर रणनीति तैयार रखनी चाहिए।[11][12]

कुछ प्रमुख बचाव:

  • चेक security purpose के लिए दिया गया था, किसी enforceable debt के लिए नहीं।[12]
  • complainant ने consideration नहीं दिया, या transaction ही फर्जी है।[11]
  • चेक पर हस्ताक्षर मान्य नहीं हैं, या चेक चोरी/दुरुपयोग से भर दिया गया।[13]
  • नोटिस सेवा नहीं हुई, या limitation के भीतर complaint नहीं है।[7][9]

Complainant की ओर से:

  • transaction के दस्तावेज़, ledger, bill, agreement, या loan receipt आदि पेश करें।[13][2]
  • बैंक रिकॉर्ड, SMS/e‑mail, whatsapp chats आदि से यह दिखाएँ कि लेन‑देन वास्तविक था।[3][6]
  • यदि security cheque है, फिर भी यह दिखाएँ कि liability crystallize हो गई थी और तब चेक प्रस्तुत किया गया, ताकि legally enforceable debt मौजूद था।[11][12]

Accused पक्ष के लिए व्यावहारिक सुझाव

यदि आप defence side पर हैं, तो presumption के बावजूद आपके पास पर्याप्त scope है, बशर्ते आप शुरुआत से strategy‑based defence तैयार करें।[11][12]

  • cross‑examination में complainant से transaction की details, source of money, income‑tax records आदि पर सवाल पूछकर उसके version में contradictions निकालें।[12][13]
  • यदि cheque blank signed दिया गया था, तो परिस्थितियाँ और contemporaneous correspondence दिखाकर यह साबित करने का प्रयास करें कि यह misuse है, न कि debt repayment।[13][11]
  • limitation, notice, jurisdiction जैसे technical grounds को भी नज़रअंदाज़ न करें; कई मामलों में केवल इन्हीं आधारों पर अभियोजन विफल हुआ है।[7][9]
  • compounding/settlement के अवसरों पर client को व्यावहारिक सलाह दें, खासकर जब दस्तावेज़ complainant के पक्ष में हों; इससे लंबी criminal litigation से बचा जा सकता है।[10][3]

कोर्ट‑क्राफ्ट और व्यवहारिक टिप्स – Young Advocates के लिए

  • File perfect, argue simple: 138 के केस में drafting जितनी मजबूत होगी, argument उतने सरल होंगे। facts और dates साफ‑साफ plead करें।[2][1]
  • Chronology हमेशा तैयार रखें: एक पन्ने पर तारीख‑वार chronology (loan/transaction, cheque issue, presentation, memo, notice, complaint) बना कर रखें; जज और आप दोनों के लिए case समझना आसान रहेगा।[6][3]
  • Documents की marking पर ध्यान: हर दस्तावेज़ को exhibit कराते समय ठीक से prove कराएँ – bank witness, postal witness या tracking report की प्रमाणिकता सुनिश्चित करें।[13][6]
  • Adjournments से बचें: चूँकि नीति summary/summons trial द्वारा शीघ्र disposal की है, अनावश्यक स्थगन मांगने से कोर्ट की नाराज़गी और client का विश्वास दोनों खो सकते हैं।[3][6]
  • Case‑law के 2–3 प्रमुख principles याद रखें: हर argument में सीधे judgment पढ़ाने से बेहतर है कि आप न्यायिक सिद्धांतों को साफ भाषा में समझाएँ और आवश्यक होने पर relevant paragraph दिखाएँ।[4][13]

निष्कर्ष – धारा 138 को ‘रूटीन’ मत समझिए

चेक बाउंस के मुकदमे ज़्यादातर trial courts में रोज़‑मर्रा का हिस्सा हैं, लेकिन इनका प्रभाव parties के व्यवसाय, क्रेडिट‑वर्थनेस और न्यायालयों के समय पर गहरा पड़ता है।[1][6]
यदि युवा अधिवक्ता शुरुआत से ही ingredients, limitation, presumption और practical court‑craft को समझकर काम करें, तो वे न केवल सफलतापूर्वक 138 के मामलों को संभाल सकते हैं, बल्कि अपनी समग्र criminal/commercial practice के लिए मजबूत नींव भी तैयार कर सकते हैं।[12][2]


  1. https://bhattandjoshiassociates.com/section-138-of-negotiable-instruments-act/                          
  2. https://blog.ipleaders.in/section-138-of-negotiable-instruments-act-1881/               
  3. https://www.linkedin.com/posts/ca-lokesh-totlani-finwise_chequebounce-section138-legalupdates-activity-7401470842813091841-ImFq            
  4. https://api.sci.gov.in/supremecourt/2022/2731/2731_2022_12_1501_60153_Judgement_17-Mar-2025.pdf     
  5. https://ssrana.in/ufaqs/ingredients-of-section-138-of-negotiable-instruments-act-in-india/       
  6. https://tarungaur.in/mediacenter/cheque-bounce-case-india-section-138-guide/                       
  7. https://delhihighcourt.nic.in/app/showFileJudgment/NBK05012026CRLMM72212025_182121.pdf  
  8. https://www.scobserver.in/supreme-court-observer-law-reports-scolr/jai-balaji-industries-v-m-s-heg18149/      
  9. https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ec015a01f0597ac4bdf35c24846734ee/uploads/2024/03/2024091140.pdf    
  10. https://www.scribd.com/document/478882966/10-Landmark-Judgments-on-NI-Act   
  11. https://www.scobserver.in/supreme-court-observer-law-reports-scolr/discriminatory-exemption-from-payment-of-tax-to-locally-manufactured-goods/       
  12. https://www.scconline.com/blog/post/2023/10/12/explained-supreme-court-verdict-principles-of-presumption-evidential-burden-under-ni-act/           
  13. https://judiciary.karnataka.gov.in/kjablr/assets/articles/Negotiable Instruments Act.pdf         
  14. https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s3ec03333cb763facc6ce398ff83845f22/uploads/2024/09/2024091181.pdf
  15. https://vlex.com/vid/section-138-negotiable-instruments-584547970