‘डिजिटल अरेस्ट’ क्या है? जानें BNS और IT एक्ट के तहत इसके कानूनी प्रावधान और सजा
“डिजिटल अरेस्ट” (Digital Arrest) कानूनी शब्दावली का हिस्सा नहीं है और इसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) के तहत सीधे तौर पर किसी विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है। यह मूल रूप से साइबर अपराधियों द्वारा ईजाद किया गया एक संगठित घोटाला है, जिसमें तकनीक और मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि इस नाम का कोई विशेष कानून नहीं है, लेकिन इस कृत्य को अंजाम देने की पूरी प्रक्रिया में मौजूदा कानूनों की कई गंभीर धाराएँ एक साथ लागू होती हैं, जो इसे एक संगीन आपराधिक मामला बनाती हैं।
इस पूरी धोखाधड़ी की शुरुआत आम तौर पर पुलिस, सीबीआई (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED) या कस्टम अधिकारी बनकर कॉल करने से होती है। इस कृत्य पर BNS की धारा 204 (लोक सेवक का प्रतिरूपण) लागू होती है। इसके तहत फर्जी अधिकारी बनकर डराने वाले जालसाजों को छह महीने से लेकर तीन साल तक की जेल और जुर्माने की सजा हो सकती है। जब ये अपराधी पीड़ित को झूठे केस (जैसे पार्सल में ड्रग्स या मनी लॉन्ड्रिंग) में फंसाने का डर दिखाकर उन्हें अपने पैसे किसी “सुरक्षित खाते” में ट्रांसफर करने के लिए राजी करते हैं, तो यह सीधे तौर पर BNS की धारा 318 (धोखाधड़ी) के दायरे में आता है। इस अपराध में धोखाधड़ी से संपत्ति या धन ऐंठने पर सात साल तक की कैद और जुर्माने का स्पष्ट प्रावधान है।
अपराधी अपने दावों को असली साबित करने के लिए अक्सर व्हाट्सएप या स्काइप (Skype) पर फर्जी गिरफ्तारी वारंट, सुप्रीम कोर्ट के जाली आदेश या सरकारी लेटरहेड भेजते हैं। दस्तावेजों की इस तरह की जालसाजी के लिए BNS की धारा 336 और 336(3) (जालसाजी) लागू होती है, जिसमें सात साल तक की जेल हो सकती है। इसके बाद शुरू होता है पीड़ित को कैमरे के सामने बंधक बनाकर धमकाने का सिलसिला। अपराधियों द्वारा धमकियों और गिरफ्तारी के डर का इस्तेमाल करके जबरन पैसे वसूलने की इस प्रक्रिया पर BNS की धारा 308 (जबरन वसूली) का बेहद कड़ा प्रावधान लागू होता है। इसमें पीड़ित को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर धन उगाहने के अपराध में दस साल तक की कैद और जुर्माना निर्धारित किया गया है।
चूंकि यह पूरा अपराध इंटरनेट और संचार उपकरणों के माध्यम से होता है, इसलिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) के प्रावधान इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। जब साइबर ठग पीड़ित के आधार कार्ड, पैन कार्ड या अन्य व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल करके उसे डराते हैं या उसकी पहचान का दुरुपयोग करते हैं, तो IT एक्ट की धारा 66C (पहचान की चोरी) के तहत कार्रवाई होती है, जिसमें तीन साल तक की जेल और ₹1 लाख तक का जुर्माना हो सकता है। इसी तरह, वीडियो कॉल या फोन पर पुलिस या जांच एजेंसी का भेष धरने और कंप्यूटर या मोबाइल संसाधनों का उपयोग करके प्रतिरूपण (Impersonation) करने पर IT एक्ट की धारा 66D लागू होती है। इसके तहत भी तीन साल तक की कैद और ₹1 लाख तक का जुर्माना तय किया गया है।
गिरफ्तारी और कानूनी नोटिस भेजने की असली प्रक्रिया इन साइबर ठगों के दावों से बिल्कुल विपरीत है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 63 यह स्पष्ट रूप से अनिवार्य करती है कि किसी भी समन या नोटिस की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी केवल तभी कानूनी रूप से मान्य है जब वह पूरी तरह से एन्क्रिप्टेड हो, उस पर सक्षम अदालत की मुहर लगी हो और वह अधिकारी द्वारा डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित हो। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने फैसलों में यह साफ किया है कि व्हाट्सएप (WhatsApp) या किसी अन्य अनौपचारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से गिरफ्तारी का कोई भी नोटिस या वारंट नहीं भेजा जा सकता है। कानूनी रूप से, किसी भी नागरिक को वीडियो कॉल के माध्यम से “डिजिटल रूप से गिरफ्तार” नहीं किया जा सकता है, जो इस बात को पूरी तरह प्रमाणित करता है कि ऐसे कॉल केवल एक सोची-समझी आपराधिक साजिश का हिस्सा हैं।










